बिहार के कई जिलों में खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ताजा मामला ऐसे जिले का है जहां खाद्य पदार्थों की जांच के लिए स्थानीय प्रयोगशाला (लैब) ही नहीं है। नतीजतन, मिलावट की जांच के लिए खाद्य नमूने पटना भेजे जा रहे हैं, जिससे रिपोर्ट मिलने में कई सप्ताह का विलंब हो रहा है। इस देरी से न केवल निगरानी प्रभावित हो रही है, बल्कि मिलावटखोरों को बच निकलने का मौका भी मिल रहा है।
जिला खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, नमूने संग्रहित करने के बाद उन्हें पटना स्थित राज्य खाद्य प्रयोगशाला भेजा जाता है। वहां से रिपोर्ट आने में 15 से 30 दिन तक लग जाते हैं। इस बीच दुकानदार या व्यापारी द्वारा मामले को प्रभावित करने या सबूत मिटाने की आशंका बनी रहती है। स्थानीय स्तर पर त्वरित जांच न होने से उपभोक्ताओं को भी राहत नहीं मिल पाती।
विशेषज्ञों का मानना है कि हर जिले में आधुनिक खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला होनी चाहिए, जिससे मिलावट की तुरंत पहचान हो सके और कार्रवाई में तेजी आए। वर्तमान में राज्य में केवल कुछ ही जिलों में लैब की सुविधा है, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों से भेजे गए नमूनों की रिपोर्ट में देरी होती है। इससे खाद्य सुरक्षा अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी सवाल उठते हैं।
स्थानीय व्यापारियों और उपभोक्ताओं ने भी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि जब तक रिपोर्ट आती है, तब तक मिलावटी सामान बाजार में बिक चुका होता है। ऐसे में जांच का उद्देश्य ही फेल हो जाता है। कई बार नमूने खराब होने या परिवहन में देरी के कारण रिपोर्ट विफल भी हो जाती है, जिससे दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती।
जिला प्रशासन का कहना है कि शीघ्र ही स्थानीय स्तर पर एक अस्थायी जांच केंद्र शुरू करने की योजना है, जिससे नमूनों की प्रारंभिक जांच हो सके। हालांकि, अभी तक कोई ठोस समय-सीमा नहीं दी गई है। खाद्य सुरक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य सरकार को जिले में लैब स्थापित करने का प्रस्ताव भेजा गया है, जिस पर जल्द निर्णय की उम्मीद है।